संस्कार


संस्कार लँगड़ी अवधारणा है

जिसकी एक टाँग तंदुरुस्त

व दूसरी को मार गया है लकवा


बहु-बेटी पर तो लागू है जन्म से

मगर पुरुश के पौरूश से हार कर

स्त्री की बेसाखी के सहारे जा रहे है 

एक जनरेशन से दूसरी जनरेशन मे


माँए कोस रही है 

अपनी कोख को

जिसने जने कुपुत्र

बेटों ने अनाथ कर छोड़ा है वृद्ध बाप को

अंधे की लाठी के नाप घटने लगे है

बिजली के मीटर तक बँटने लगे है


ये दुपट्टे 

जिनके बग़ैर वर्जित है छत पर टहलना भी

ये वो फंदे है 

जो बाप पहनाता है 

और माँ चेताती है हर बार दहलीज़ लाँघने पर

ये हर दफा गले में रहते है

कोई पंखा मिलने तक


संस्कार बेटी के विवाह मे तो याद आता है

पर बेटे पर लागू नही होता

जब वो मनमर्ज़ी से उठा लाता है 

इसके नाम पर होती है ऑनर किलिंग

और अब तो ऑनर किलिंग भी संस्कार बन गया है जैसे

जिसे निभाता है बाप बाप के छोटे बड़े भाई

और लड़के की राखी से बँधे अनुज

सीना चौड़ा करके नाक ऊँची उठाए


वक्त के साथ संस्कार भी बदलने चाहिए

और सबके हिस्से मे बराबर बँटने चाहिए

वरना दुप्ट्टे फंदे बनते रहेंगे

गलत कारणों ले सुर्ख़ियो मे रहेगी हमारी नदियाँ

और पवित्र झीलें 

मानव लहू से शापित रहेगी रेलें 

बेटियों की हत्या से ना संस्कार स्थापित होते है

ना संस्कृति फूलती है 

बेटी के झूलने से 

माँ भारती को शर्मिंदगी होगी