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"पञ्च - पल्लव" / "अजान" - विवेक मिश्र

सजा जब उन सबका दरबार तो उसे सजा हो गयी,
काफिरों की क़ज़ा ही से कातिलों की मजा हो गयी,

बजा तो देते वे खुदा के बन्दे भी ईंट से ईंट बंदगी में,
ज़िंदगी उनकी दोस्ती में ही सही मौत से रज़ा हो गयी,

वक्त आया है शब बन के सहर को न कोसिये जनाब,
सूरज की तपिश
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