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"होनी-अनहोनी" - विवेक मिश्र


किस्सा है बहुत खूब सबके साथ उसका होते जाना,
जन्मना बड़ों का दिखा करतब बच्चों सा होते जाना,

गलत था गर सही सही होगा गलत ये तय है तब तो,
बुतों का भगवान व कुछ इंसानों का बुत होते जाना,

चला था जानने मुकाम वो राह जाने किस दिशा की,
राह का मुकाम व हर मुकाम का सरे राह होते जाना,

पाबंदियों का इश्क परवान चढ़ा है गुस्ताखों से अब
पाबंद था होना जहाँ वहाँ गुस्ता
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