उपला 


गाँव देहात में मुफ्त मिलता है उपला

माँए पाथ देती है 

चट्टान के माथे पर

दीवार की पीठ पर

सूरज के चेहरे पर

दिन को मूँह चिढ़ाता उपला

घटाता रहता है वज़न 

बढ़ाता रहता है दहक 


इंसान ने जब इजाद की आग का 

कर दी इस गोबर के हवाले 

चुल्हे से खेत खलियान तक

मंदिर से शमशान तक

यही सहेजे रखता है आग

रात के गर्भ में सुबह के प्रसव तक


ये गेहूँ है 

ये मुफ्त कहीं नहीं मिलती 

इससे पनपती है सभ्यता 

इसे बाँधों तो पनपते है बंधुवा

बनते है ग़ुलाम

इससे भूख मिटती है

इसे उगाना पढ़ता है खेतों में

बहुत श्रम लगता है

आठ महीने जाते है


ये कार्पोरेट है

ये तीन सो रुपये किलो बेचता है उपला

इसके हाथ जब आएगी गेहूँ

तो सोंचों क्या होगा