मैं भी किसान


मैं भी किसान हूँ 

छोटा सा -छोटा अपनी रसोई जितना

अपने बच्चे के निवाले जितना छोटा 

पिता की खेत बंजर ना करने की ज़िद जितना छोटा

पार्ट टाईम ही सही 

पर मै किसान तो हूँ 

और मान करता हूँ अपनी बिरादरी का

शामिल पाता हूँ खुद को उनके सुख-दुख में

मुझे समझ आती है उनकी मजबूरियाँ 

वक्त बेउमर उभर आई झुर्रियाँ 

और चमड़ी का रंग 

जो पैदायिशी भूरा नही था


मगर मेरे भाई

एक ईमान की कहूँ 

इसयूरियाके भाड मे भुनी गेंहूं के तुम्हें क्या दाम दूँ?

ये मिट्टी जो ज़हर बन चुकी है 

मिट्टी जिसने गोबर की तासीर तक ना चखी कभी

इस मिट्टी मे पालक उगने की ऊम्मीद कैसे करूँ 

दूध जो सुखा दे स्तन नवप्रसुता के

उस दूध को दूध कहने मे अचरज है मुझे


मै साथ खड़ा हूँ तुम्हारे 

मेरे पुर्खों के नाते

मेरे पुरखे जिन्होंने उगाई अदरक सूखे पहाड़ों पर

और बेची सोंठ परशिया तक


मगर 

ये तो तुम भी जानते हो और मैं भी

कि हम फ़सल नही 

चाँदी उगाने में लगे है

चाँदी जिसे खाने से कोयला होने को है पुश्तें हमारी। 


-विवेक