अंधेरी रात,सुनसान दीवार की ओट पर बैठे,
दो सिर, चार आंखें और
गूंजते सन्नाटों के शोर को सुनते चार कान।
थे दो मन, पर एक थे,
बुनने में लगे थे सर्द रातों का सामान।
गुजरा तभी मखमली घास पर स्वर्णमृग,
लिए दोनों मनों की छद्म पहचान।
ब्रह्मराक्षस निकला वो,
जब तृष्णा से हटकर की उसकी पहचान।
एक मन, एक सिर, दो आँखे और दो कान,
फिर हुए विक्षिप्त सब जान।
दूजे मन ने जो चुना स्वर्णमृग,
अधूरा छोड़ सपनों की सर्द रातों का सामान।
