कहानी ये जीवन की, मैदान - ए - जंग जैसी है
कहता हूं तो रोता हूं, कलम लिखती है तो रोती है।
गगन में उड़ते बादल से, मेरे ख्वाब उड़ते हैं
मैं गिरता हूं के बारिश में जैसे बूंद गिरती है।
आंधी में के धूल जैसे, मै छतरी बनाता हूं
बारिश में ये सारी धूल धरा पर बैठ जाती है।
बन कर पतंग गर मैं बादल तक पहुंचता हूं
दुनिया की पतंगे ये मुझको काट जाती हैं।
कट कर आसमां से मैं धरा पर आ जो गिरता हूं
के आते हैं लुटेरे सारे के ये दुनिया लूट लेती है।

