जीवन की कश्ती में किनारे ढूंढ़ रहे हैं
अथाह समंदर में सहारे ढूंढ़ रहे हैं
यूं तो कमल खिलते हैं तालाबों में
आजकल बसंत की बहारे ढूंढ़ रहे हैं।
बैठे हैं वो ख़ुश्क आंखे लिये
शायद मोहब्बत की बहारें ढूंढ़ रहे हैं।
ज़नाब, इश्क़ करना गर तो हारे लोगो से
जीते लोग तो सिर्फ़ किनारे ढूंढ़ रहे हैं।
रातो में वो सोए थे गहरी नींदों में
फ़कत दोपहर में चांद तारे ढूंढ़ रहे हैं।

