कल तक हुस्न को नक़ाबों में छिपे देखा था

आज सिकंदरों को नकाबों में छिपे देखा है

वो हक़ीक़त थी ख्वाबों से उतरी मोहब्बत की

आज ख्वाबों को हक़ीक़त में सिमटते देखा है


कल तक वो ग़ुरूर में तमन्नाओं के गीत गाते थे

आज उन्हें दीवारों के पीछे खुद को ढूंढते देखा है

कौन कहता है कि बदले वक़्त ने दस्तक दी नहीं

हमने महफिलों को तन्हाईयों में सिमटते देखा है


गुज़रे ज़माने में उनको अपनी शोहरत से मोहब्बत थी

बर्बाद होते इस ज़माने में हमने उनको लुटते देखा है

वो महफिलों में बेपनाह पैमानों में झूमते लड़खड़ाते थे

खोये मैखानों में हमने तन्हाईयों में जाम सिमटते देखा है


कातिल अफ़साने थे उनके कभी खोयी उस हक़ीक़त में

लुटे ख्वाबों में हमने उनको इतिहास पलटते देखा है

खंडहरों में ढूँढ रहे हैं ताज़ वो जो उनसे छिन गया है

नए सरताज़ों से उन्हें हाथ जोड़ फकीरी करते देखा है


कल तक छिपी थी वो ज़िन्दगी उलझी उन पर्दो में

आज ताबूतों में उनके खोये नामों को उभरते देखा है

गुम हुई शमशीरों की बेबूझ बहकती रौशनी में हमने

खौफ से सिकंदरों को हमने नकाबों में सिमटते देखा है


मौत इतनी ज़ालिम होगी ये हमने सोचा न था

दौलत मंदों को इस जंग में हमने लुटते देखा है

एक है हक़ीक़त उस खुदाई नूर की छिपी सी इनमें

कुछ फकीरों को हमने मोहब्बत में मिटते देखा है