हम धीरे-धीरे नव वर्ष में आगे बड़ रहे हैं l पिछले कई वर्षों में हमने संघर्ष किया, न सिर्फ महामारी से, बल्कि खुद से भी l कुछ वर्षों पहले महामारी के प्रकोप से कुछ लोग बच गए, कुछ चपेट में आये, कुछ लोगों ने अपनों को और साथ में ही बहुत कुछ खोया l सरकारें कहती गयीं इन बीत गए वर्षों में कि लॉक डाउन हटा है पर महामारी नहीं । महामारी का नाम लेने में भी कुछ विभागों में प्रतिबन्ध लगा दिया गया। अब जो भी हो, आप समझ ही गए हैं । बस अब समझने लायक यही है कि वो महामारी जो मिटी नहीं, अपना असर तो ज़रूर छोड़ गयी है । साथ ही इतिहास के पन्नों में अपना नाम भी जोड़ गयी है l जितना उसे मिटाने का प्रयत्न हुआ, उतने ही विकराल रूप में वो उभरी । अभी तो फिर आ रही है, एक नए से अंदाज़ में । ग़जब रूप है उस महामारी का । सुना था कि जिसका जन्म हुआ है वो मृत्यु को अवश्य प्राप्त होगा । पर इसका तो जन्म कहाँ हुआ, कैसे हुआ, प्रश्नवाचक चिह्न हैं इसके अस्तित्व पर । और फिर वायरस तो होता ही ऐसा है, कोशिका के बाहर मृत और कोशिका के भीतर जीवित । अब पुनः प्रश्न उठता है कि जिसके जन्म का कोई मूल नहीं तो मृत्यु का कैसे होगा । खैर छोड़ते हैं इस विषय को यहीं पर I इस प्रश्न का उत्तर एक विशिष्ट वर्ग ढूंढ ही रहा है, कहीं दूर किन्हीं प्रयोगशालाओं में । ख़ैर, रहस्य तो बना ही रहेगा । जब बात रहस्य की हो, तो यह जीवन भी तो एक रहस्य है जो जीया जा सकता है l लेकिन अगर इसको एक समस्या की तरह लिया जाए तो समाधान ढूँढना कठिन है ।
आइये अब आते हैं जग प्रसिद्ध, यक्ष प्रश्न पर ।
यक्ष का युधिष्ठिर से पूछा गया अन्तिम एक प्रश्न था:
दिने दिने हि भूतानि प्रविशन्ति यमालयम्।
शेषास्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्।।
(अर्थात : प्रतिदिन ही प्राणी यम के घर में प्रवेश करते हैं, शेष प्राणी अनन्त काल तक यहाँ रहने की इच्छा करते हैं। क्या इससे बड़ा कोई आश्चर्य है?)
जिनमें से एक (किमाश्चर्यम्) के उत्तर में युधिष्ठिर ने कहा :
अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम्।
शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम् ॥
(अर्थात : प्रतिदिन ही प्राणी यम के घर में प्रवेश करते हैं, शेष प्राणी अनन्त काल तक यहाँ रहने की इच्छा करते हैं। इससे बड़ा और क्या आश्चर्य हो सकता है!)
अगर ध्यान से समझा जाय तो यह प्रश्न और उत्तर एक समान ही है । पहले प्रश्नवाचक है और बाद में विस्मय बोधक । यही जीवन का रहस्य है । तुम बस जीए चले जाते हो, विस्मित से, खोये-खोये से, एक भटकाव में । इन सबके बीच में कहीं एक अनुगूंज रहती है शान्ति की, जो अंतर निहित सी है । लेकिन बाहर के शोर में विलुप्त सी रहती है । ब्रह्मज्ञ योगी तो यह भी कहते हैं कि इस संसार में नाद स्वर हमेशा गूंजता रहता है । नाद स्वर प्रबलतम प्रातः के चार बजे होता है, इसलिए वह समय ब्रह्म मुहूर्त भी कहलाता है । सुना है कि उस समय पक्षी भी वेद पाठ करते हैं । समूची सृष्टि एक लय बद्ध संगीत की धुन पर चल रही है । इन सबके बीच में हो तुम, शोर में, भटके हुए, समस्याओं में, प्रश्नो में, उत्तर ढूंढते हुए, खोये-खोये से । ईश्वर की सबसे बड़ी रचना हो तुम, इस मनुष्य रूप में । पर क्या मनुष्य का अस्तित्व यही है ? एक विस्मित अस्तित्व, एक भ्रमित स्वप्न, एक प्रदूषित मानसिकता, एक व्यर्थ का बवंडर । नहीं, नहीं । तुम यह सब नहीं । अगर तुम एक रहस्य हो तो तुम खुद को ढूंढ सकते हो । लेकिन उसके लिए तुम्हें खुद के भीतर अन्तर्निहित शांत संगीतमय नाद को समझना होगा । मेरे सामने रोज़ कुछ लोग अलग-अलग प्रकार की समस्याएं लेकर आते हैं । मैं सोचता हूँ कि समस्याएं किसके पास नहीं । जीवन का अर्थ है समस्या । शरीर और मन की समस्याओं में सबसे पीड़ित रहता है तुम्हारा अस्तित्व । अब कीया क्या जाए?
जीवन असल में एक छवि है । जैसा यक्ष प्रश्न की शब्दावली में था । विज्ञान कहता है कि छवि दो प्रकार की होती है - वास्तविक और मिथ्या । आजकल तो सभी इसी मिथ्या संसार में विलुप्त से रहते हैं। तुमको अचरज होगा इस कथन को सुनकर। चलिए तुमको समझाता हूँ । अंतरजाल को अंग्रेज़ी भाषा में इंटरनेट कहते हैं । यह अंतरजाल का संसार मिथ्या संसार(अंग्रेज़ी में वर्चुअल वर्ल्ड) ही तो कहलाता है। मनस विद कहते हैं कि आजकल बहुत सी समस्याएं मानसिक रोगों के कारण उत्पन्न हो रही हैं । आइए समझें कि यह मिथ्या संसार आख़िर क्या है । यह मिथ्या संसार मनुष्य के मस्तिष्क में उत्पन्न होते विचारों का प्रतिबिम्ब है । आपने सुना होगा कि अंतरजाल में बहुत अनुभव होता है इन विकृत भावनाओं का जैसे धोखा, जालसाज़ी, भ्रष्ट आचरण, पतित विचार, वासना पूर्ण चर्चा, झूठ, व्यसन इत्यादि । अध्यात्म में कहा गया है कि प्रत्येक मनुष्य के पास तीन शरीर होते हैं - स्थूल, सूक्ष्म तथा आत्म शरीर । स्थूल शरीर जो आप हैं, जिसका एक नाम है । परन्तु सूक्ष्म शरीर है - मनस, चित्त, बुद्धि तथा अहंकार । यह अहंकार है जो एक अवरोध का काम करता है, आत्म शरीर तक पहुँचने के लिए । जब आप ध्यान करते हैं तो मन के इन्हीं बवंडरों का सामना करते हैं क्यूंकि अर्द्ध-चेतनावस्था से उभरते विचारों में पूर्व जन्मों की गन्दगी उभरती है I जब आप अपना अधिक समय अंतरजाल के मिथ्या संसार में बिताते हैं तो आपका सामना उन करोड़ों लोगों की अर्द्ध-चेतनावस्था के विकारों का सामना करने में बीतता है I ऐसा नहीं कि सारे विचार कलुषित होते हैं, पर अधिकतर तो होते हैं I यह ठीक एक ग्रंथालय की तरह है जिनमें असंख्य पुस्तकें हैं, लेकिन आपका चरित्र आपको उन्हीं पुस्तकों की ओर आकृष्ट करता है जो आपका चरित्र बाध्य करता है I अंतरजाल में भी व्यक्ति की चारित्रिक संभावनाएं विभिन्न विचारों से परिचय करवाती हैं I बार-बार योगी लोग यही कहते हैं कि सत्य बाहर कहाँ ढूंढ रहे हो, सत्य तो तुम्हारे भीतर है । पर हम सत्य तक पहुँच नहीं पाते क्यूंकि बाहर बहुत शोर है । संगीतज्ञ कहते हैं कि जो लय बद्ध नहीं, वह शोर है । चूँकि मनुष्य प्रकृति की संगीतमय धुन से लय बद्ध नहीं, इसलिए वह भटकाव में है । एक शोर में, खोया-खोया सा । इसलिए यह सच जान पड़ता है कि जीवन एक रहस्य है केवल जीते जाओ । लेकिन कुछ एक दीवानें उभर जाते हैं इस शोर से और ढूंढते हैं उस संगीत की धुन को अपने अंतर मन के पार । ऐसे दीवाने मतवाले होते हैं, लेकिन वही संसार में परिवर्तन की गूंज में एक लय बिखेरते हैं । ऐसे दीवानों को हम बुद्ध पुरुष कहते हैं । कृष्ण, राम , बुद्ध , महावीर, नानक, कबीर, रामकृष्ण, इत्यादि-इत्यादि इन्हीं दीवानों के अलग अलग नाम हैं । खुदा की ख़ुमारी लग जाए तो फिर शराब फ़ीकी पड़ जाती है । अपनी शायरी को कहता हूँ :
हम तो तुम्हारी नूरानी अदा पर कुछ इस तरह दीवाने हैं,
कि एक खुमार तुम्हारी याद का इस ज़हन में रहता है ।
यूं लगता है कि डूबे रहें ख्याल में तुम्हारे कुछ इस तरह
इस ख्याल का एक नशा इस वीराने दिल में रहता है ॥
ख़ुमारी आ जाये तो जीवन फिर रहस्य नहीं रहता, नए आयाम खोल देता है। अब इतना जान लीजिये कि जब तक आप शोर में हैं आप तनाव में ही रहेंगे क्यूंकि जीवन तो एक संगीतमय लय की एक मधुशाला है, जहाँ पर ख़ुमारी मिल रही है बेहिसाब । पैमानों की बात कहाँ, बस ख़ुमारी मिलनी चाहिए । लेकिन ज़रा संभल के । कहीं संगीत की लय छोड़ कर तुम शोर की ओर भटक गए तो तुम्हें यह नशा लुड़का देगा । फिर तो तुम्हारा सफर उर्ध्व गति की ओर नहीं, बल्कि अधो गति की ओर हो जाएगा । इसलिए संभल कर कदम उठाना होगा क्यूंकि बर्बाद तो तुमको होना ही है । अब यह निर्णय तुम्हारा है कि तुम्हें खुद को ख़ुमारी की संगीतमय धुन में संभालना है या फिर खुद को जाम की लय विहीन शोर में बहकाना है । निर्णय तुम्हारा है ।
आज इतना ही।
[विवेक पाठक "सुदर्शन"]
