इस बदलते मौसम में शायद कुछ सो सा गया है

कुछ तो है जो इन सबमें कुछ ढल सा गया है

सब कुछ तो है मगर कहीं कुछ खो सा गया है

सब कुछ तो है मगर कहीं कुछ बदल सा गया है


वो चिड़ियों का चहचहाना, वो कोयल का कूकना

वो सुनसान सड़कों पर हिरणों का मस्त सा चलना

वो मुंडेर पर बैठे बन्दर का कुछ अंगड़ाईयाँ सा लेना

वो पेड़ों की झुरमुट से किसी का चुपके से सरकना


वो शाम की महकती धूल में गायों का लौटना

वो सुबह की चहकती धूप में पंछियों का उड़ना

वो पुरवाई की ठंडी सी बयार का तन को छूना

वो गेसू मटकाती परियों का ख्वाबों में उमड़ना


वो सूने पड़े मकानों से लोगों का चहकना

वो मलहार पर किसी के पैरों का थिरकना

वो गुम सी हो गयी नींद में अंगड़ाई लेना

वो आँखें खोल कर बगीचे के गुलों को देखना


ये सब कुछ अंदाज़े बयां बदल सा गया है

शायद कोई दुर्भिक्ष अभिनन्दन हो सा गया है

ये सब मौसम की रुसवाई में छुप सा गया है

शायद कोई अनभिज्ञ परिवर्तन हो सा गया है



इस बदलती तस्वीर में आज भी एक तस्वीर अभी भी वही है

आध्यात्मिक अनुवेदना के समभाव की तकदीर अभी भी वही है

प्रभु के अनुनाद भाव में मिश्रित आशाओं का चित्र अभी भी वही है

खोये ख्वाबों में उठती मलहार की मधुर गूँज अभी भी वही है


इन ठहरे ख्वाबों से मुझे कुछ रास्ता दिखा देना

अगर मैं भटका हूँ तो मुझे मार्ग बता देना

मैं तो आज भी तेरे दर पर हाथ फैलाये खड़ा हूँ

इस बदलते मौसम में मुझे अपना बना लेना