सोचा था दो वक्त की 

रोटियां नसीब होंगी

कभी न कभी दो पल की

खुशियाँ करीब होंगी

दौड़ते इस शहर में 

कहीं तो ठहराव होगा

बहते हुए इस जीवन का

कहीं तो पतवार होगा

डूबते हुए शाम को

सुबह की रोशनी मिलेगी

काम करते रहे अगर तो

मंजिल भी जरूर मिलेगी


बस यही सोच एक दिन

छोड़ घर को आ गया

ऐसा ही करना होता है

खुद को ये बतला गया

ऐसी की मेहनत मैंने 

कि खून पसीना बन गया

धूप हो या छांव हो

सबसे मैं कुम्हला गया

पेट भरने के लिए 

रात को दिन बना गया

सपनो की तलाश में

अपनों को भुला गया


ताज महल दूसरों के

दिन रात हम बनाते गए

अपने घरौंदे के भी

आशा यूँ सजाते गए

ठोकर न खाये बच्चे

जीजान से कोशिश करते गए

उज्जवल हो भविष्य उनका

दिल को ये समझाते गए

कल की चाहत में

आज को कचोटते गए

जिएंगे हम भी एक दिन

ऐसा इंतजार भी करते गए


रात यूँ ढलती गयी

दिन यूँ गुजरते गए

थोड़े सपने हुए पूरे

बाकी यूँ बिखरते गए

देश की बुनियाद की

नींव यूँ हिलते गए

हवाई जहाज की क्या बिसात

साइकिल की चक्के भी टूटते गए

उमर की इस पड़ाव पे अब

सपने भी नाउम्मीद हो गए

खड़े हैं हम आज भी वहीँ

जहाँ से हम चलते गए