सुना है जल जाते है लोग आग से मैंने शहर कि चमक में लोगों को जलते देखा है, चले आते है कुछ पाने की चाह में सोचकर जीवन अच्छा होगा कुछ सफल भी है और कुछ नही भी, कुछ कि पहुँच घरों तक है कुछ फुटपाथ पर भी ज़िंदा है, सम्मान था निष्ठा थी पहले वाले घर बहुत बड़ी किमत चुकाई कुछ पाने के लिए , समय नहीं लगता लोगों को यहाँ ईमान बेचने में यहाँ सड़कें तो साफ है पर मन मैले हैं, नदियों सी है जिंदगी यहाँ पर रास्ते बहुत है पर मंजिल एक ही है, जिंदगी की असमंजस में जो इस धुंधली चमक को पहचान गऐ जा रहें है अपने असली घर की ओर, और जो नहीं समझे वो अभी भी आगंतुक है। -विश्वनाथ कुशवाहा