एक पहाड़

जिसके सीने से 

निकलती नदियां 

हर अंग पे उगे बहुत से पेड़ 

जिसके कंधे पे सिर रख कर 

बादल रोता बार बार 


एक नदी 

पत्थरों को तोड़ कर

बहती रहती दूर तलक 

सींचती प्यासी धरती को 

बसाती नए शहरों को 

फिर अपने ही वज़ूद को 

खो देती अथाह समंदर में 


एक खेत 

खुद की छाती को चीर कर 

हर मौसम मे अनाज देता 

खुद की आशाओं को 

गहराई से दफन करके 

बड़ी इमारतें बनाता 


एक पेड़ 

खड़ा रहता अविरल 

पत्तों से भरपूर शाखाएं 

छाव देतीं जन जन को 

पूस की सर्द रातों मे 

जल कर राख हो कर 

मानुस को गर्मी प्रदान करता


एक फूल 

तितलियों को प्रतिदिन 

आकर्षित करता

खुद की जड़ से टूट कर 

महफिल को महकाता 

कभी गेसुओं मे बीध कर

बालाओं को खूबसूरत बनता 


फिर तुम पूछती हो 

मैं क्यु घूमता हू 

पहाड़ों पे क्यु जाता हू 

नदियों के घाट पर 

घंटों क्यु बैठता हू 

पीपल के पेड़ के आगे 

अपना सिर क्यु झुकाता हू 


मैं सीख रहा हू 

जीवट जीवन को 

जीने का तरीका 

इन्हीं पहाड़ों से , 

हरदम बहती नदियों से 

खेत खलिहानों से 

पेड़, पत्तों से और 

खिलखिलाते फ़ूलों से