बंद दरवाजे से झाँकती स्त्रियां
कुछ कहना चाहती है
कुछ बताना भी चाहती है
किन्तु कुछ कह नहीं पाती
बस झाँकती रहती है
आंचल में बंधी
जिम्मेदारियों की गठरी
घूँघट ने नीचे
सपनो को दफ़न करती
सिंदूर लगा के
अस्मिता को सौपती
स्कूल जाते बच्चो को देख के
पीहर को याद कर लेती है
खुद को जला कर
गोल गोल रोटियां बना देती है
सबकी सुध लेते लेते
बेसुध होक सो जाती है
मनिहार से प्रसाधन खरीद के
जख्मो को छुपा लेती वो
खुद प्यासी रह कर भी
तुलसी को पानी देती वो
सब कुछ संभल के भी
परछाई ही बन पाती वो
© विश्वदीप गौतम "बदहवास"


