पढ़ें और भूल जाएं!!!

(बंजर पड़ी जमीन में एक बीज बो रहा हूं, मुझे पता है)


•बड़ी शिद्दत से जिस ग्रुप को बनाया था,

साथ मिल कर एम०ए० के नौनिहालों ने,

आज उसकी प्रासंगिकता है खतरे में,

सनद रहे कि कहीं "NAM" न हो जाए वक्त के थपेड़ों में,


•पहले नाम बदला,

फिर डीपी,

फिर बदले लोग, और संख्याबल बदला,

आज "लिंक शेयरिंग" के सिवा कुछ भी नहीं,

आज कक्षा की सूचना के सिवा कुछ भी नहीं,


•"सर आयेंगे?", "सर जाएंगे?" "क्लास नहीं होगी?", और "किसका असाइनमेंट पूरा हुआ है"?,

से आगे न बढ़ पाए!

अफ़सोस कुछ भी नहीं,

बस व्हाट्सएप के चैट पर एक अनायास सा भ्रमित ग्रुप यूहीं भ्रमण करता है,

बस याद दिलाता है, कि सदुपयोग की कमी ने मुझे मेरे तिलिस्म से अंधा कर दिया!


•इस वर्ष के दो कार्यकाल देखा है,

तालाबंदी में ग्रुप की छटपटाती भवितव्यता बर्दाश्त नहीं होती थी,

शायद! इसीलिए कुछ सोचा-बूझा, और फिर कुछ मतलब की बात की,

अफ़सोस हुआ, कि वाद तो बना, प्रतिवाद भी बना, परंतु संवाद की कमी खली!


•आज समन्वय की दरकार है, इतनी तपिश के बाद यही कहूंगा!

समर शेष है, पर समय नहीं, यही कहूंगा!

पशोपेश में न उलझो तुम, "औ" न उलझे हम बस यही कहूंगा!

वरना न बचेगा कुछ और न बनेगा कुछ, बस यही कहूंगा!


•सोचा एक शाम कि हटा दूं,

पूछने पर मित्र ने रोक दिया,

शायद इसलिए, कि पहल जिसने की इसकी सर्जना में,

आज उसे यूहीं नहीं ठुकरा सकते इक क्षण में!