#तालाबंदी:

इक बात है, की समझ में आती नहीं

की यह तालाबंदी हुई क्यों?

जब अखबारों में, दूरदर्शन पर दूर से दर्शन किया,

तो पाया लोगों को मरते यूं।


सरकारों की आंखें खुली

जब जब इसकी रफ़्तार बढ़ी,

पर फिर बेचैन हुआ यह मन,

की कारण बनी, कि गई है गढ़ी!

तब कोरोना 'साहब' आके बोले मुझे,

नहीं अब बताऊंगा बातें सही की आया किधर से और जाऊं किधर को,

घनचक्कर बनाऊंगा मैं अब तुझे।


तालाबंदी लगी, सब ठप होने लगा,

जैसे परीक्षा में स्याही खत्म होने लगी!

अधीर होता गया, सामने दुकान देखकर,

क्योंकि तालाबंदी में अब वो भी न मिलने लगी।


दुकानों पे जब जब ये ताले पड़े

तो 'दू'कानों में यह दर्द बढ़ने लगा,

'मित्रों' कहकर वो जब जब संबोधित लिए,

तब दर्द कानों में बढ़ने को फिर चल पड़ा!


लोग कहते हैं कि 'बेटा' थोड़ा धीरज रखो,

कैसे मानव हो तुम थोड़ा ऊर्जा भरो,

इन्द्रियों को निज में नियंत्रित करो,

ये तूफ़ान है पार अब कर चलो।


अब कैसे बताएं की बेटा भी मानव है,

सोचकर हो बेचैन हुआ है तभी तो दानव है!

~विष्णुकांत चतुर्वेदी