#मित्र सदा से आया है!

•"मानस पंखों को नभ देखकर, विहग जिसने बनाया है,

उन पंखों को डोरी देने, वह मित्र वहीं से आया है!


•ठहराव मिली, दुविधा में दिखते, बांते बांट नहीं पाए,

मुखभाषा से वह भांप गया, समझो मित्र वहीं से आया है!


•हर चिरात्मा में विद्यमान, 'हरि' बनके राह दिखाता है,

देर भले ही हो "सुदामा"! पर मित्र अवश्य ही आया है!


•पिता रूप, या मातृ रूप, शिक्षक में हो या देव रूप,

हर कल्प, काल, युग से ऊपर, मित्र सदा से आया है!"