#केशववाणी!


"कैसा बखान और किसका बखान करूं, जब ब्रह्माण्ड का क्षण, कण, और निर्माण भी तू!

बालक में गोविंद भी तू, वाद्ययंत्र में मुरली भी तू,

बचपन में ग्वाला भी तू, माखन प्रेमी वाला भी तू,

देवकी से जन्मा भी तू, यशोदा से पलता भी तू,

मथुरा में भी तू, नंदगांव में भी तू,

बंदीगृह में जन्मा भी तू, कंश का काल भी तू,

अब देखता बस तुमको हूं, सोचता बस तुमको हूं,

पांडवों में पार्थ भी तू, नारायणी सेना में भी तू,

भार्या में रुक्मणि का तू, और राधा का कृष्णा भी तू,

प्रयाग धरा का माधव तू, जलचर में मत्स्य भी तू,

मुरली को धारण करता भी तू, और सुदर्शन चक्र धारक भी तू,

पापियों का नाशक भी तू, पापनाशक भी तू,

पालनहार भी तू, जगती का आदिस्रोत भी तू,

भक्तों में नरसिंह भी तू, नारी में मोहिनी भी तू,

वृक्षों में पीपल भी तू, सर्पों में शेषनाग भी तू,

कल्कि अवतार भी तू, और वामन अवतार भी तू,

धर्म पथ का मार्ग भी तू, दायित्व बोध का सार भी तू,

पांडव की विनती भी तू, द्रौपदी का सम्मान भी तू,

भीष्म पितामह का प्रिय भी तू, प्रेम सागर की नैय्या तू,

कुरुक्षेत्र का रचयिता तू, कुरुक्षेत्र में संहार भी तू,

दशावतार रूप भी तू, और विराट रूप लेता भी तू,

पार्थ का सारथी भी तू, पांडव का गंतव्य भी तू,

भीष्म प्रहार को रोकने वाला भी तू, सूर्यपुत्र पर विजय भी तू,

जयद्रथ वध का कारक भी तू, पांडव पुत्र का प्राण भी तू,

राजनीति का चक्र भी तू, कूटनीति का कौशल भी तू,

रणनीति का केंद्र भी तू, पथप्रदर्शक में भाग्य भी तू,

विप्लव की बेला भी तू, शांति पहर सी संध्या भी तू,

देवों में इंद्र भी तू, गुरुओं में कार्तिकेय भी तू,

पक्षी में गरुण भी तू, समर काल की भूमि भी तू,

युद्ध समर का आरंभ भी तू, आग्रह को निकला शांतिदूत भी तू,

भस्मासुर का अंत भी तू, शाश्वत स्वर वाला शंख भी तू,

पुष्पों में गेंदा भी तू, पौधों में तुलसी-पत्र भी तू,

रंगों में पीला भी तू, ग्रहों में बृहस्पति भी तू,

त्रेता युग में राम भी तू, शेष शैया पर विष्णु तू,

कलयुग का वह प्राण भी तू, जिसमें धर्मपथ का अभिमान बसे,

यही निवेदन कर रहा हूं, प्रशस्त कर हर वह पथ, जो पुण्यता की ओर चले!

सोचता बस तुमको हूं, देखता बस तुमको हूं,

कण कण में! हां क्षण में और निर्माण में!


~विष्णुकांत चतुर्वेदी~✍️✍️✍️