•"मैं वीर सपूत हिन्द अंचल का, सर्वस्व त्याग करने आया,
आज़ादी के दीवानों सा तिल तिल मिटने को आया,
इस दानी कवच, अपार शक्ति की द्योतक मेरी वसुंधरा,
जब जब इसकी पुकार सुना, मैं दौड़ा दौड़ा भागा आया!
•शिक्षक में हो विष्णुगुप्त या शासक में हो चंद्रगुप्त,
एक सूत्र की माला में जन जन के मोती को चुनना,
अखण्ड ज्योति सा संकल्प लिए, राष्ट्र पताका सजने में,
निज प्राण समर्पण करने को, "चैतन्य" बसा जनमानस में!
•मैं हिन्द वीर 'अर्जुन' जैसा, मैं पंचतत्व का रूप ही हूं,
मैं ही नभ सा विस्तृत वर्णन, सागर बन बैरी को लील भरूं,
मैं पावक बन बन राख करूं, मैं वायुवीर का रूप धरूं,
मां धरा का आंचल स्वर्ग लगे, शहादत में बैकुंठ चलूं!
•'जीजा' मां का वीर 'शिवाजी', 'राणा प्रताप' का चेतक भारी,
'गोरा', 'बादल' की तलवार है प्यासी, मेवाड़ी दुष्टों पर भारी,
लक्ष्मीबाई विदुषी रानी, झांसी में जगदम्ब बने,
हुंकार भरी ऐसी मानो, युग-यौवन हिंद का गान करे!
•मैं सैनिक सवा शेर सा, रिपु के दल को शीर्ण करूं,
क्षण में गांधी की लाठी बन, कश्मीर भ्रांति को दूर करूं,
तो क्षण में भगत जैसा भी बन आतंक समर का काल बनूं,
राष्ट्र के लिए खप जाऊं, निज प्राण अभय बलिदान करूं!
•बीते सदियों में बलिदानों की, गाता चिर पुराण गाथा,
त्याग, तपोबल, कंटक पथ पर चलती रही जवानी थी,
पर वर्तमान में, मैं 'लाल' हिन्द का, सेवक बनने को आया,
संकल्पधर्मा बन रुधिर कह रहा, हो भस्मसात रिपु की गाथा!
•युनानों का अलक्षेन्द्र या द्वापर की कौरव सेना!
शत्रु रूप में बर्बर गोरी, या छद्मयुद्घ हो खिलजी का,
मुगलों से हो धर्म विभाजन, या ब्रितानी खंडित चेहरा,
तब 'चन्द्रगुप्त' भी, 'पार्थ' भी मैं, 'आज़ाद', शिव का मैं संहारनाद!
•सन् बासठ का हो युद्ध, या 'लोंगेवाला' की पावन भूमि,
कारगिल में हो हड़कंप मचा, दुश्मन की बुज़दिल टंकार सुनी,
याद करो हे शत्रु, कितने 'विक्रम' ने शीश तेरा है खंड किया,
बलिदान हुए, पर अभिमान तिरंगे, को प्राणों से रंग दिया।"
✍️✍️✍️~विष्णुकांत चतुर्वेदी~✍️✍️✍️

