#मूकप्रेम!


राह में यूं चलते हुए एक कली पर नज़र पड़ी,

देख, ठेहरा मन, फिर जाके उसपर लड़ी,

जैसे पवन वेग से एक झंकार सुनी,

रोम पर छाई जैसे सुमन रंजनी!


हृदय की धड़क पर इठलाता हूं मैं,

जैसे सीढ़ियों को ही पाके, फ़िर मंज़िल मिले,

पास सोचा की जाऊं, गुफ्तगू भी पले,

प्रेमी बनके हुआ उसका मारा हूं मैं!


तेरी झलक से हुआ मन सुधा की वह माला,

पर जब औरों को देखूं तो लगे विष प्याला,

जैसे हाला में मदमस्त होता दीवाना,

अब तो ठानी है, पीके रहूं मधुशाला


समझा जिसे इत्र, वो लगे खुशबुओं सी,

रसायन नहीं, उन परागों में पलती,

जहां मधुप की मगन चाशनी में तुम डूबी,

मैं तुम्हारे संवरने में दिन रात रत हूं!


तुम्हें देख कर रुक न पाया प्रिए,

जैसे पुष्पों को डाली से लेता हूं मैं,

विवशता नहीं, तू अंतस में बसी,

उत्तरों का हूं राही, निहारूं तुझे!


मेरे लिए तुम श्लोकों की माला,

मेरे लिए तुम वेदों की शाखा,

तुझी को ही पढ़ता, तुझी में हूं रहता,

तुम्हीं प्रेरणा हो, अब तुझी में हूं रमता!


~विष्णुकांत चतुर्वेदी~✍️✍️✍️