#कैदी बनकर मत जीना!
हर दिनांक में खुद को अंकित,
समय, काल की कल कल में बहता,
क्षण के अंक में खुद को बहता,
जीवन ऐसा निर्झर पाया!
इस समय के सिरहन का अनुभव,
इन दीवारों के प्रासादों में,
भवन लगे मन को कानन,
कैद हुआ, औरों में मैं!
विश्व, संघर्षों से झूझ रहा,
कैदी बनके ही जीता है,
अनुशासन को विकृत करके,
तब राग विकल की क्यों गाता?
भाग्य विधाता तू निज का है,
खेल-प्रपंचों में मत उलझा कर,
अच्छा खासा जीता आया,
मत अनायास जी कैदी होकर!
कैदी मत बन इस दुनिया का,
विहग गगन सी आशा रख,
कैदी मत कर मानव मन को,
मानवीय दृष्टांत तो रख!
क्या पाया है क्या खोया है?
पाया है भूपों का प्रासाद, और खोया मन का तेज प्रवाद,
बस ध्यान रहे, हे प्रबुद्घ मानव!
कि, कैदी बन कर मत जीना! बस कैदी बन कर मत जीना!
~विष्णुकांत चतुर्वेदी~


