
#जब प्रकृति समाजवाद लाएगी!
"अमीर गरीब के बीच चौड़ी लकीर खींचने वालों,
इस दुनिया को अपने 'रसूख' पर नचाने वालों,
माझी की कश्ती पर जहाज़ चलाने वालों,
मेरी झोपड़ी को रौंद, उस पर अट्टालिका बनाने वालों,
एक बात है जो कहना है, इन रईसों से,
कि इन अट्टालिकाओं का रूप बदलेगा, क्योंकि
वायु का रूप अब बवंडर लेगा,
चक्रवात का रूप तब 'निसर्ग' और 'अंफान' ले चुका होगा,
अग्नि का रूप वह ज्वालामुखी लेगी,
और, धरा के कम्पन से गुजरात स्मरण होगा!
इसमें मानव कुछ नहीं कर सकेगा!
और तब मार्क्स और हर गरीब का जीवन साकार होगा,
जब प्रकृति समाजवाद लाएगी!
जब प्रकृति समाजवाद लाएगी!
कभी कभी, कुछ पौधे स्वयं की तकदीर होते हैं,
उन्हें रोपा नह
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