#जब प्रकृति समाजवाद लाएगी!
"अमीर गरीब के बीच चौड़ी लकीर खींचने वालों,
इस दुनिया को अपने 'रसूख' पर नचाने वालों,
माझी की कश्ती पर जहाज़ चलाने वालों,
मेरी झोपड़ी को रौंद, उस पर अट्टालिका बनाने वालों,
एक बात है जो कहना है, इन रईसों से,
कि इन अट्टालिकाओं का रूप बदलेगा, क्योंकि
वायु का रूप अब बवंडर लेगा,
चक्रवात का रूप तब 'निसर्ग' और 'अंफान' ले चुका होगा,
अग्नि का रूप वह ज्वालामुखी लेगी,
और, धरा के कम्पन से गुजरात स्मरण होगा!
इसमें मानव कुछ नहीं कर सकेगा!
और तब मार्क्स और हर गरीब का जीवन साकार होगा,
जब प्रकृति समाजवाद लाएगी!
जब प्रकृति समाजवाद लाएगी!
कभी कभी, कुछ पौधे स्वयं की तकदीर होते हैं,
उन्हें रोपा नहीं जा सकता, उन्हें पाला नहीं जा सकता,
सोचा करता मानव जब, कि यह विकसित कैसे होते हैं?
तब पाता बरगद और सरीखे, शाखों पर वंशज बनते हैं!
निर्भर नहीं औरों पर यह, तो लेती क्या तुमसे मानव!
दवा बनकर मरहम का रूप तो कभी क्रुद्ध जैसी दानव!
निकृष्ट कृत्यों में रत मानव, आरंभ तुम्हीं से होता है,
काटा, फेंका, शीर्ण किया, बर्बरता तुम्हीं से होता है,
आपस में कटे, मरे, बर्बादी का आलम जग सहता है,
धरती को खण्डों में बांट, युद्धों से काट, देख प्रकृति के आंसू बहते हैं!
क्षोभ, व्यथा, पीड़ा का स्वर तब समाज पर होता है,
जब प्रकृति का तेज़ प्रवाह प्रबलता की पराकाष्ठा को छूते हैं,
तब समझलो कि प्रकृति समाजवाद लाएगी!"
हां! तब प्रकृति समाजवाद लाएगी!
~विष्णुकांत चतुर्वेदी~


