#हर घड़ी:
-> "हर घड़ी, जब जब मुझे तेरी राह खुद की 'घड़ी' में दिखे,
तो उन तीन सूइयों से यही पूछता, कि उसका आना है कब?
फ़िर उसके आने का संदेशा मुझे नहीं मिलता घड़ी घड़ी भर,
व्याकुल मन, शिथिल आंखें, जिनकी राह में अंदेशा लगाती भर भर,
वो कहीं दिखने नहीं वाला यह कहता खुद से मैं जी भर कर,
इन्हीं क्षणों में आंखें आती भर भर,
इन्हीं क्षणों में सांसें जाती थम थम,
पर जब जब निहारता खुद को आइने में मगर,
तब मन कुछ कहा करता, वह क्या है मगर?
निज के रोदन की अग्नि में खुद को दहा करता!
झुलसते शरीर हों फिर भी उसकी राह तकता!
प्रकृति के कभी कभी थपेड़ों को छांव बना कर, उसी में रहा करता,
केवल इसीलिए, की उसकी झलक मेरी ओझल आंखों को सुकून दे दे, बस यही मन मुझसे कहता!
हर घड़ी, बस हर घड़ी!"
~विष्णुकांत चतुर्वेदी ✍️✍️✍️


