शीर्षक : "चलते चलते ही राह कटेगी"


अगर सही और गलत, दोनों का ज्ञान है!

तो त्रुटियां होती हैं क्यों?

अगर चैतन्यवस्था में रहकर भी हो अचेत,

तो आखिर दोष किसका है?

निर्णय के निर्माण, या समयचक्र में गुंथा है,

वर्तमान की त्याग कर भविष्य में यूं लीन क्यों?

अन्तर्द्वंद में, अवसाद की तपती कम्बल में रहता,

फिर आखिर दोष किसका है?

हर क्षण इक प्रश्न का होना हो, उस पर भी उत्तर विक्षिप्त लगे,

ढूंढा करता अनुभव में, अनुमानों में उत्तर मिल जाता,

त्रुटियां करता, दोषी होता, पर हार नहीं मैंने माना !

चलते चलते ही राह कटेगी, ध्येय निकट है दूर न कहना!


खुद की स्थिरता जब विचलित लगती,

खुद का साहस जब हिलने लगता,

बस ध्यान ध्येय में एक रहा,

कि भविष्य अंकुरित, आज में है!

शायद, प्रयत्न सब मूर्छित हों,

शायद, विचार कुछ अपरिपक्व दिखें,

हर बार यह भी मान चलो,

कि हर कोशिश हारी ही जाएंगी !

आशंकाएं अपरिमित, संभाव्य शून्य हो जाएंगी,

आशा में कुछ कब मिल जाए पर,

इस आशा में ध्येय न धुंधला करना,

चलते चलते ही राह कटेगी, ध्येय निकट है दूर न कहना!