शीर्षक- बनता बलिदानी 'लोकमान्य'!
"राष्ट्र एकता, प्राण प्रणेता, जनमानस ने प्रणपान किया,
पुनर्जागरण, राष्ट्रवाद, संकल्पित मन है प्राणवान,
तिलक सुशोभित है मस्तक पर, आर्यवर्ती मान 'तिलक' से हो,
शक्तिजागरण धर्म से हो, राह दिखाई गांधी को,
संघर्ष, परिश्रम, त्याग, समर्पण, से बनता बलिदानी 'लोकमान्य'!
स्वाधीन पवन की लहरों से मृत में जीवन जब जाग उठे,
उदारवाद, संविधानवाद, ब्रितानी अब तो मान्य नहीं,
यम, काल दिखा अब द्वार खड़ी, भावी पीढ़ी के प्राणपुंज पर,
ये 'अति' विनाश लेकर आया, तो मैं घोरप्रलय का संघारनाद,
तिल तिल मिटने को आतुर, बनता बलिदानी 'लोकमान्य'!
अंग्रेज़-मसानी आतुर थी, शोषण करके बलिदानों का,
रुधिर पी गए, भगत, आज़ाद, तिलक वीर स्रोतों का,
रणचंडी ने तब जीभ काढ़, दस्यु-दलन करती दुर्गा!
वीरों के क्रोधानल में शंकर का तांडवस्रोत सुना!
हाहाकार मचा जितना भी!
'हर हर' ने सर्वस्व किए को अमरत्व विधान बना डाला!"
बनता बलिदानी 'लोकमान्य'!
बनता बलिदानी 'लोकमान्य'!


