घुटनों से टेकते-टेकते, कंधों पर बैठते-बैठते
झूला, गोद से झूलते-झूलते, ठंड- गर्म से खेलते-खेलते
बरसात में, तेरे आंचल की छतरी से निकलकर,
न जाने कब! न जाने कब!
पैरों पर अपने खड़ा हुआ? ना जाने कब मैं बड़ा हुआ?
वो दिन भी बेशुमार था, तेरे मार में भी प्यार था
तुझसे दूर, पर ऐतबार था, मजबूर था, पर आंखों में इंतजार था,
पर, ना जाने क्या बात है?
आंखें हैं, तेरी थकी क्यों? झुर्रियां हैं दिख रही क्यों?
जो कंधों-पीठ पर बैठा सकता था,
लोरियां दिन-रात सुना सकता था,
समय के आगे वहीं निरुपाय हो जाता I
प्रबल ना रहते हुए असहाय हो जाता,
मां! मैं जैसा था, वैसा हूं
मैं, बिल्कुल तेरे जैसा हूं
माना थोड़ा कच्चा हूं
पर, तेरा ही तो बच्चा हूं l
***विष्णु मिश्रा***

