इस हकीक़त से परे इक ज़िंदगी है गुमशुदा
मैं जहां बहतर हूं मेरी हर कमी है गुमशुदा
उसकी पेशानी पे मेरे है लबों का गीलापन
उसको ना चूमूं तो मेरी शायरी है गुमशुदा
पास उसके जो रहूं तो ज़िंदगी पूरी लगे
दूर जाऊं तो लगे के हर खुशी है गुमशुदा
इक अधूरापन था मेरे सुर्ख अश्कों का सबब
उसको पाकर मेरी आंखों की नमी है गुमशुदा
तूने तो विष यूं ही उसका रख दिया था नाम ये
और वो बरसों से ख़ुदको कह रही है गुमशुदा
