मेरे कमरे से है आती  एक आहट

जाने मुझको क्या बताती एक आहट


मुझको लगती है परेशां थोड़ी सी वो

कोई ग़म का गीत गाती एक आहट


कुछ तो कहना है उसे पर कैसे समझूं

सिसकियों में बुदबुदाती एक आहट


एक मुद्दत में हूं भूला उसको मैं अब

याद उसकी फ़िर दिलाती एक आहट


बस अकेलापन है साथी अब मेरा विष

उस अकेलेपन की साथी एक आहट