बीती कई रातों से,

नींद नहीं आती है।

दिल-औ-दिमाग के बीच कहीं,

जान अटक जाती है।।

प्यार में नींद,

उड़ जाने की बातें,

मैंने भी सुनी हैं।

मेरे साथ लेकिन,

ऐसा कुछ नहीं है।

मुझे किसी कली से,

प्यार न हुआ है।

मगर यह पहली,

मर्तबा हुआ है।।

कि बीती कई रातों से,

नींद नहीं आती है।।


एक डर सा,

सीने में,

घर कर गया है।

कुछ एक लोगों का,

मेरे लिए कुछ एक ,

विचारों का होना।

कहर कर गया है।।

एक माता-पिता हैं।

और एक मैं हूँ।

बीच में कुछ एक,

कॉपी-किताबें हैं।

कलम पर उम्मीदों का,

पुल बना हुआ है।

पता नहीं मुझे,

क्या कुछ हुआ है।

कि बीती कई रोतों से,

नींद नहीं आती है।।


कमरें में किताबें,

बढ़ती जा रहीं है।

आँखे नशे में,

चढती जा रहीं हैं।।

मगर फिर भी,

जी नहीं भरता।

मरता क्या नहीं करता?

जी! सुना है मैंने।

पर यहाँ मरने से ज्यादा,

जीने की बात है।

और इंसान जीने को,

क्या कुछ नहीं करता?

कल जीने की खातिर,

आज मरना पड़ता है।

एक चीज जिसे लोग,

हद कहतें हैं।

उससे हर रोज,

गुजरना पड़ता है।।

पर शायद यह,

जोश तो नहीं है।

क्योंकि जोश तो बहुत,

बड़ी चीज होती है।

मगर यह जरूर है कि,

बीती कई रातों से,

नींद नहीं आती है।।


~विशेष मिश्रा