साल हर साल की,
तरह ही बीत गया।
मुझे यह मालूम नहीं,
मैं हारा कि जीत गया।।
आगामी क्षण में सब,
धुधंला नजर आ रहा है।
सच कहूं, मानोगे?
मन घबरा रहा है।।
एक आप बीती का,
खयाल आ रहा है।
फिर से मायूसियों का,
भय खाता जा रहा है।।
मैंने क्या खोया है,
मैंने क्या पाया है।
जब जब यह सोंचा है,
तब तब दिल रोया है।।
यत्न मैं करता रहा,
हाथ मगर खाली है।
है यही गर' जिन्दगी,
तो खाक जिन्दगानी है।।
जीत मैं पाया नहीं,
हार नहीं मानी है।
सच कहूं, जिन्दगी,
संघर्ष की कहानी है।।
~विशेष मिश्रा
