इस कदर गुलाबीं हैं तेरे अधर।
इनके आगे गुलाब भी क्या बेचेगा।।
यह भंवरा तेरा 'विशेष' नाम का।
जब भी इन तलक जा पहुँचेगा।।
तो कुछ पलों को मेरी।
नजरें न हटेगी।।
ऐसा नहीं कि मन में।
तरंगें न उठेंगी।।
दिल अहसास पाने को।
बेताब हो उठेगा।।
नजदीक ज्यों ज्यों जाऊँगा।
होंठ कंपकंपा उठेगा।।
पर अभी मैं इंतजार करना।
पसंद करूँगा।।
मुझे जो लगता है।
मैं वही बोलूँगा।।
क्योंकि अच्छी चीजे।
छूने से बिगड़ जाती हैं।।
औ मुझे तेरे होंठो से।
प्रेम काफी है।।
इसिलिए अहसास पाने का।
सोंचने से डर लगता है।।
तेरा होंठ मुझे।
गुलाबी शहर लगता है।।
तेरे अधरों की तासीर।
हवा जैसी है।
वैसा सासं लेना भी।
तुम्हे छूने जैसा ही है।।
~विशेष मिश्रा
