हे आसमां ! तुम्हे नापना बाकी है तुम्हें आंकना बाकी है, कितना है आकर तुम्हारा तुम्हे बांचना बाकी है, क्या है उस पार तुम्हारे तुम्हे झांकना बाकी है, धरती के एक सपने को तुमपर टांकना बाकी है, हे आस्मां ! तुम्हे नापना बाकी है। हे आसमां ! तुम कितने छोटे कितने बड़े हो तुम कितने बैठे हो कितने खड़े हो कभी न झुकने वाले मस्तक से कितने मुड़े हो और कितने अड़े हो समुद्र की लहरों मिलकर के तुम कितने गिरे हो कितने उठे हो यह भी भांपना बाकी है हे आस्मां ! तुम्हे नापना बाकी है। हे आसमां ! कितने चाँद तुम्हारे हैं कितने चाँद से मुखड़े हैं तारों की गिनती कितनी है तारों के कितने टुकड़े हैं रफ़्तार तुम्हारी कितनी है कितने जीवन उखड़े हैं कितनी रातों में सुख है कितने दिन के दुखड़े हैं तुम्हारे सुख दुःख को धरती से बांटना बाकी है हे आस्मां! तुम्हे नापना बाकी है। हे आसमां इस कागज़ की भांति ही कभी साफ़ हो कभी मैले हो कभी कविता बन जीवन हो कभी गाली बन दुशैले हो इस ओर उस पार बीच कभी साथ कभी अकेले हो मेरे जीवन की ही भांति आस्मां तुम अलबेले हो यश अपयश भरे दौर में तुम्हे छांटना बाकी है हे आसमां ! तुम्हे नापना बाकी है।