याद आती गयी और मैं बैचैन होता रहा.... नींद आई नहीं फिर भी मैं युहीं सोता रहा … ख्वाब आते और खो जाते.... सिलसिला यूँ चलता रहा… मैं पागल ना जाने क्यों ख्वाब संझोता रहा। पर इरादा ना ये बदला… ना आँखे मेरी थकी.... ना कुदरत ने कुछ किया और ना हवा कुछ कर सकी.... झोंके आए पल दो पल को.... मैं अपनी धुन में बहता रहा… बस… यादों के मेहमाँ को अपना मैं कहता रहा। ना मालूम क्या होगा कल परिणाम मेरे ख्वाबों का… ना हिसाब ही मैंने जोड़ा बैचैन दिन जगी रातों का … फलसफा ही ऐसा रखा हैं… सूखे में बीज बोता रहा… बादल खामोश थे.… बस मैं ही.… छुप छुप के रोता रहा।