"मैं जिंदगी की बात लिखता हूँ,अपने ख़यालात लिखता हूँ।यादों के घने बादल सेआंसुओं की बरसात लिखता हूँ। मैं लिखता हूँ, मसलकर हाथों में ठंड की गरमाहट,मेरे लबों पे तेरी पी हुई, सुबह की चाय का स्वाद लिखता हूँ ।किसी बेतरतीब से बिखरे हुए घर जैसा मैं,तेरे नफ़ासत से संभाले हुए हालात लिखता हूँ। मेरे धुले सिमटे कपड़ों की तहों के भीतर,तेरी खुशबु की करामात लिखता हूँ ।तकिये की सलवटों में लिखता हूँ वजूद तेरा,बिस्तर की नमीं में खुद के जज़्बात लिखता हूँ। मैं जिंदगी की बात लिखता हूँ,अपने ख़यालात लिखता हूँ।यादों के घने बादल सेआंसुओं की बरसात लिखता हूँ। जब लिखा था माथे पे तेरे,गीत होठों ने मेरे,उस वक़्त तेरे थरथराते लबों के, सवालात लिखता हूँ। वो बढ़ी हुई धड़कने मेरी, वो चढ़ी हुई साँसे तेरी,उस दिन की वो अधूरी सी, पूरी रात लिखता हूँ। तुम आओगी,मिल जाओगी, फिर किसी मोड़ पे यूँ ही,मेरी तक़दीर में तेरी, किस्मत का साथ लिखता हूँ। न मैं मुकम्मल सा यहाँ, और वहाँ अधूरी सी तू भी है,चलो बस आखरी दफ़ा ये, पहली मुलाकात लिखता हूँ। मैं जिंदगी की बात लिखता हूँ,अपने ख़यालात लिखता हूँ।यादों के घने बादल से,आंसुओं की बरसात लिखता हूँ।"विशाल गुप्ता