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जब जिम्मेदारियों का बोझ कांधे पर पड़ता है तब उंगलियां कलम पकड़ने से कतराती है, जेहन में भरे पड़े सारे जज्बात शब्द बनकर निकलना तो चाहते है परंतु अब ये संभव सा नही लगता । अब कलम की स्याही कविताएं नही लिखती, अब फोन में पड़े नोट्स सेक्शन में कोई

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