आज रात यूँही बिस्तर पर लेटे लेटे मन गाँव चला गया...

साँसें जरा थम सी गयी, चेहरे पे मुस्कान छा गया...

गाँव मेरा बिहार के एक छोटे से कस्बे में है, घर से बहुत दूर है ...

लोग बहुत खुश रहते हैं वहां, क्यूंकि तकनीक गाँव से बहुत दूर है....


याद है मुझे गाँव जाने की कितनी उत्सुकता रहती थी...

लोग बड़े मासूम थे वहां, रिश्तों में नाजुक्ता रहती थी....

घर से रिक्शा, रिक्शा से बस, बस हमें गाँव से दूर उतारा करती थी...

फिर ठेला गाड़ी रुक रुक कर घंटों में गाँव पहुंचाया करती थी....


गाँव के बीच घर है मेरा, घर के बाहर लोगों का जमघट रहता है....

मिट्टी से बना घर है मेरा, जहाँ इंसान कम एहसास ज्यादा रहता है....

चारों तरफ कमरें, बीच में आंगन और आँगन में एक खाट बिछी रहती है....

शाम जब सब घर आते हैं, चूल्हा जलता है, रिश्तों की महफ़िल सजी रहती है....


बिजली नहीं थी तब गाँव में, सड़क भी तब गाँव नहीं आयी थी.....

सहजता थी तब अपनों में, रिश्तों में धूर्तता तब गाँव नहीं आयी थी....

पिताजी की उँगली पकड़ शाम को हम खेतों की तरफ जाते थे...

गेहूँ, सरसो, अरहर, धान सबकी फसल पिताजी हमें दिखलाते थे...


कुछ दिनों का सफ़र गाँव में जैसे कुछ घण्टों में बीत जाया करता था....

शहर की शोर से दूर एक शान्ति थी गाँव में, जहाँ मन रुक जाया करता था...

सुना है अब सड़क और बिजली आयी है गाँव, लोग शहर जा चुके हैं.....

बंद पड़ा है अब वो घर बरसों से, खुशिओं के सारे पहर जा चुके हैं....