पाजेब प्रेम की जो खनक जाऐं कहीं।
छनछन में उसकी मन भटक जाएें कहीं।
निगाहें बचाता रहा मैं निगाहों से उसकी,
निगाहें ही तो है जाकर अटक जाऐं वहीं।
जब वो करती है जुल्फों से अठखेलिया,
कोई बादल आवारा-सा बहक जाऐं कहीं।
चांदनी में चांद जब देखता है चाँद दूसरा,
गुरूर चांद का भी आसमान से टपक जाऐं कहीं।
उस शौक अदा़ से जरा कोई तो कह दो,
लगकर गले मेरे बाहों में मेरी सिमट जाऐं कहीं।।

