नये दिन, नई प्यास, भर के सांसों में आस।
वक़्त के उतार चढ़ाव, मैं देखता रहा यहां।
खुशियों के पल ढूंढता, जख्म भी चूमता।
कभी मझधार बीच पतवार लिए झूमता।
बसंत की हवाओं में दर्द भी शामिल यहां।
ये जिंदगी कहां कभी मुक़म्मल इस जहां।


नये दिन, नई प्यास, भर के सांसों में आस।
वक़्त के उतार चढ़ाव, मैं देखता रहा यहां।
खुशियों के पल ढूंढता, जख्म भी चूमता।
कभी मझधार बीच पतवार लिए झूमता।
बसंत की हवाओं में दर्द भी शामिल यहां।
ये जिंदगी कहां कभी मुक़म्मल इस जहां।