ये कैसी, किसकी सियासत, ये कैसा सियासतदार है।
हमारे ही भरोसे जीतता, हमको ही बनाता लाचार है।
सत्ता का सार है, करना राजतिलक फिर इक बार है।
जनता की जो पुकार है, पाँचवें साल करना विचार है।
नारों में ललकार है, वो मसीहा है, वही मददगार है।
मोहब्बत के सौदागरों से भरा, ये वोट का बाजार है।
झूठ ऐसे अब भरता हुंकार है, खैरात की भरमार है।
बस ख्वाबों-ख्यालों में एतबार है, वादों की बहार है।
भूख से मर रहा किसान यहाँ, युवा भी बेरोजगार है।
कोई न आज तलबगार है,अच्छे दिन का इंतज़ार है।
ये कैसी, किसकी सियासत, ये कैसा सियासतदार है।
कोई न मसीहा न मददगार है, ये वोट का बाजार है।


