तुम नारी..

तुम शांत मन,सरस हृदय,कोलाहल भरे जीवन में।

तुम रौशन चांदनी सी,रात के अंधियारे आँगन में।

तुम निर्मल जल,निश्छल पवन,बहती हो निर्जन में।

तुम वसंत की कपोल कली, पतझड़ के प्रांगण में।

तुम स्वप्न,कल्पना,तुम लाज,प्रणय के उस छण में।

तुम लहर,भाव, तुम मधुर गीत, कोमल से तन में।

तुम सौंदर्य मूर्ति,दीप्त लौ बाँधती मुझे आलिंगन में।

तुम यौवन की चिंगारी,जोश भरती पौरुष प्रण में।  

-विशाल ©