इस कपकपाती ठंड के बाद,बासंती बयार आती तो है।
जिन्दगी बदलती ही सही,जख़्म पे मरहम लगाती तो है।
नाराज होते जब हम कभी,अपने गोद मे फुसलाती तो है।
चाहे भीड़ से दूर ही सही,अकेले में हम से बतियाती तो है।
वक़्त के थपेडे ही सही,ठोकरें अब हमें सिखलाती तो है।
मिलते बिछड़ते हैं जो यहीं,उनका एहसास कराती तो है।
जिन्दगी बदलती ही सही,जख़्म पे मरहम लगाती तो है।
इस कपकपाती ठंड के बाद,बासंती बयार आती तो है।
- विशाल


