मिलता हो जहाॅं दिल से दिल, नफरत का न दूर दूर तक हो नाम निशान।

हो हमारा तुम्हारा इक ऐसा जहान, जहाॅं मजहब से न हो कोई पहचान।

दर-दरवाज़े, दहलीज़, जाति और धर्म से अलग एक सोच, एक आवाम।

चाहत से भरी हरी एक जमीन और फैला हुआ उन्मुक्त नीला आसमान।