भुज बल जब मिट्टी के कण कण सांस भरता है
सूरज की किरणों संग तब अंकुर आस भरता है
अभावों से कहां टूटता वो कब वो हारा करता है
सर्दी हो बारिश या कड़ी धूप काम सारा करता है
श्रम का प्रण लिए खेतों में वक्त गुजारा करता है
फसल उगाता वो सपने साकार हमारा करता है
बूंद बूंद पसीने से धरा का आंगन सींचा करता है
हलधर कहां कब मनोबल अपना नीचा करता है


