फूलों के श्रृंगार से,सौंदर्य एक बेमिसाल से।
भीगते हुए चुनर संग,उलझते रहते बाल से।
मद भरी चाल से,सुर्ख होठ,गुलाबी गाल से।
थिरकते बदन संग,बजते हुए मृदंग ताल से।
मोहबत के ढाल से,यौवन के इस कमाल से।
कल के काल से,नटखट बन के गोपाल से।
दूर नफरत से भरे,जिंदगी के माया जाल से।
रंगों में लाल से,हवा में उड़त हुए गुलाल से।
होली खेलेते आ रहे हैं हम साल दर साल सेे।


