जिंदगी कभी कभी दुःख और सुख के बीच खींची गई उस कल्पनिक विषुवत रेखा' को तलाशती दिखती है जहां दिन और रात को कम से कम बराबर हिस्सा मिलता हो।


जिंदगी कभी कभी दुःख और सुख के बीच खींची गई उस कल्पनिक विषुवत रेखा' को तलाशती दिखती है जहां दिन और रात को कम से कम बराबर हिस्सा मिलता हो।