तेरे रहनुमाई के धूप में

मील के पत्थर से देखते रह गए हम।

गुजरे ऐसे इस शहर से,

कि तुम उस दर,उस घर के हो गए।

हम ठहरे हुए पानी से

तुम समंदर की जोर लहर से हो गए।

हम थके हुए पांव से,

तुम आग शोलों भरे डगर के हो गए।

पता नहीं हम अकेले से,

क्यूँ आज इस दर,इस घर के हो गए।