रंज सारे, चुभते रहे खंजर से, मुस्कुराऊं कैसे
ज़ख्मों के सारे दाग़, मिटते नहीं मिटाऊं कैसे
टूटे से अधूरे, बिखरे ख़्वाबों को सजाऊं कैसे
दर्द अपने ये सारे, किसी और से बताऊं कैसे
ज़ेहन में जो बस गया है, उसे भूल जाऊं कैसे
डबडबाई आंखों में, आंसूओं को छुपाऊं कैसे
पत्थर हुए जिस्म में मिट्टी का दिल पाऊं कैसे
बंजर हुई जमीन पर फिर फसल उगाऊं कैसे
- विशाल ©


