जीर्ण-शीर्ण पात को त्याग
टहनियों पर मधुर आस बसे।
नये कोंपल संग पेड़ सारे
नव उमंग ले नया विश्वास भरे।
थिरके ये मन बांसुरी पर
चाहत अब कान्हा के द्वार चले।
हवाओं में फैलाता खुशबू
राहों में गुलाल भर गुबार उड़े।
चढ़ा के फागुनी रंग सारे
ब्रज में अब बासंती बयार बहे।


