वादों का हाथ बढ़ाना

आहिस्ते से वो मेरे पास आना

सर्द मौसम का लेकर बहाना

चुपचाप तेरा वो लिपट जाना

बसंत का सिरहाना

नरम खिली धूप का वो ज़माना

ओढ़नी ओढ़ पीले सरसों बीच

तुम्हारा वो खिलखिलाना

जेठ की धूप में तुम्हारा आना

घटा बनकर छा जाना

भूले नहीं भूलता 

तेरा मुझे भूल जाना

कुछ दूर साथ चलना

फिर छोड़ जाना

अनजान मोड़ पर

तेरा यूं मुंह मोड़ जाना